मैं अकेला हूं... शांत हूं... न मुझे कोई पहचना सकता है... न कोई देख सकता है... न मेरी कोई परछाई है... और न मेरा कोई रंग रूप... मैं हर किसी के साथ हूं... हर पल मेरे लिए चलते रहना जरूरी है... फिर भी मैं दुनिया में अकेला हूं... वैसे तो दुनिया के हर जीव से जुड़ा हूं मैं... पर मेरा मानव के साथ गहरा रिश्ता रहा है... इसके पीछे सबसे बड़ी वजह... कि मानवजाति ने मुझे हल्के-फुल्के तौर पर समझने की कोशिश की है... अच्छे-बुरे, सुख-दुख, खुशी-गम, ऊंच-नीच, देश-काल और परिस्थितियों के अलावा न जाने कितने दौर से होकर गुजरा हूं मैं... और ना जाने कब तक गुजरता रहूंगा मैं... ये तो मुझे भी नहीं पता है... पर सदियों से चला आ रहा है... और मुझे खुद पता नहीं है... कि मैं कब से चला आ रहा हूं... और मेरी उम्र क्या हो गई है... न कभी रुका हूं... न थका हूं... न मैने कभी हार मानी है... और न ही कभी मैने झुकना पंसद किया.. अब कहने को मैं इतना गुणी और संस्कारी हूं... पर मुझे इनका कोई फायदा दिखाई नहीं देता... इतनी सारी खूबियां मैं अपने अंदर समेट चुपचाप, शांत और एकांत में बैठा हूं... हर किसी को साथ लेकर चलना चाहा है मैने... फिर भी कोई मेरे साथ नहीं चल सका... सब मेरा साथ छोड़ते चले गए... ना किसी की सांसें इतनी मज़बूत और ना किसी के इरादें इतने बुलंद कि वो एक लंबा समय मेरे साथ चल सकें... मेरे साथ रह सकें... अब कोई मेरे भी अकेले पन को समझने की कोशिश करें...हर कोई मुझे थका हारा सा-बेजान दिखाई पड़ा है... सच मानों तो मुझे इस दुनिया-जहान की फिक्र हर पल सताए जाती है... मैं हर किसी के दिलों और सांसों में बसना चाहता हूं... लेकिन फिर भी कोई मुझे जानने, पहचाने और समझने की कोशिश क्यों नहीं करता... अब कोई मेरी मज़बूरी को समझने की कोशिशें क्यों नहीं करता... आख़िर कोई मुझे भी तो बताए मेरे पहचान क्या है... मेरी जात क्या है.... मैं किस धर्म का हूं... मैं किस देश का हूं... मैने किस मां की कोख से जन्मा हूं... मेरी मर्यादा क्या है.... लेकिन कोई बताने को तैयार नहीं है... आख़िर कार मुझ मैं ख़राबी क्या है...हर कोई मुझे कोसता है... और एक बड़े अपराधी की तरह देखता है... मुझे ऐसे लगने लगा है कि अब हर कोई मुझ से मुहं छिपाना चाहता है... वैसे मुंह छिपाने का पात्र मैं नहीं है... खुद वो लोग है... जिन्होंने मुझे समझने की कोशिश नहीं की है... जो अपनी जिंदगी दो घूंट शराब समझ कर प्याले में ही छोड़ देने चाहते है... और जिनके लिए जिंदगी सिगरेट से निकलते धुएं की छल्ले की तरह हवा में उड़ा देना चाहते है... खैर अब मैने खुद अपने आपको समझने की कोशिश की है... जिसके बाद मुझे एक बात समझ में आई है... कि मुझे याद तो हर कोई करता है.... लेकिन अपने आगोश में कोई नहीं समेटना चाहता... और न ही कोई मुझे दिल से चाहता है... हां इतना जरूर है... कि अगर किसी के साथ बुरा होता है.... तो वो मुझे ज़रूर कोसता है... और अगर अच्छा होता है... तो हर कोई सारी वाह-वाही खुद ही लूट ले जाना चाहता है... मानो मेरा उसके साथ कोई रिश्ता ही ना रहा हो... मैने कभी किसी को अकेला और तनहा नहीं छोड़ना चाह... मेरे किताब में किसी को अकेला और तन्हा छोड़ देने का शब्द ही नहीं लिखा गया... अब मानव जाति की इतनी सारी दुश्वारियों, बेरुखियों और बेरहम आवाज़ों के बाद मैने खुद अपने-आपको समझने का बीडा उठाया है... खुद को पहचाने की अपनी ही धुन मैं निकल पड़ा हूं एक लंबे रास्ते पर... पैदल और नंगे पाव... चलता जा रहा... जिस किसी के भी दरवाज़े पर मैं गया... सभी मुझे धिकारते गए... लेकिन कुछ लोग मुझे मासूम दिखाई पड़े... मेरे दिल ने चाह की तेज़ी से दौड़ कर जाऊ और इन्हे गले से लगा लूं... लेकिन मन में एक डर था.... कहीं ये बेचारे मेरे कंधे से ही सिमट कर न रह जाए... खैर यही सोचता हुआ मैं आगे बढ़ा... और फिर से अपने आपको जानने की कोशिशों के बीच एक लंबे से रास्ते पर चल दिया... रास्ता इतना लंबा दिखाई पड़ रहा था... कि एक पल के लिए मुझे लगा कि कम से कम अब मुझे एक ऐसा साथी मिल गया... जो लंबे समय तक मेरे साथ दे सकेगा... लेकिन ये मेरी आंखों का धोखा था.... मैं दो ही क़दम चल पाया था कि वो रास्ता ख़त्म हो गया... जिसे में लंबा समझ रहा था... बाकी आगे जो भी कुछ बचा वो एक छोटी सी गली ... मुझे यकीन नहीं हो रहा था.. कि ये सब कैसे हुआ... मीलो लंबा रास्ता पलक झपकते ही कैसे ख़त्म हो गया... ये सब चमत्कार कैसे हुआ ? मैने गली और लंबे रास्ते के बीच खड़े होकर देखा... तो पाया चारों तरफ लोगों की लंबी लाइन लगी है.. मानो हर कोई मुझ से गले मिलना चाहता हो... मैने सभी लोगों को आवाज़े दी की रुक जाओ... पर हर कोई मेरे तरफ बढ़ता रहा... मैने फिर से ज़ोर से चिल्ला कर आवाज़ दी... रुक जाओ... पर कोई नहीं रुका....और मेरे तरफ बढ़ते रहे... मैने चेतावनी भरे लहजे में कहा मुझे पहचानों और मेरे तरफ मत भागों..... लेकिन कोई मेरे आवाजे़ सुने को तैयार नहीं था... सैकड़ों करोड़ों की भीड़ मुझे से आकर लिपट गई... और चंद पलों में सारी लंबी लाइनें ख़त्म हो गई... मैं खुद नहीं समझ पा रहा था.. कि जो लोग मुझ से आकर सिमट रहे है.... वो कहां जा रहे है... सब कहां खप रहे है...आख़िर मुझ में ऐसा क्या है कि जो भी मुझ से आकर सिमट रहा है,... वो खाख होता जा रहा है... खैर मिनटों में चारों तरफ की भिड ख़त्म हो गई... और फिर से मैं अकेला खड़ा रह गया... लेकिन इस दौरान मैं अपने आपको समझ पा रहा था... कि मैं वो समय हूं जो कभी ठहता नहीं है... कभी किसी का इतज़ार नहीं करता .... मेरा काम सिर्फ चलते रहना है... अब ये दुनिया जाहन की कमी है कि वो मेरे जिम्मेदारियों को नहीं समझती.. मैं हर किसी को समझाना चाहत हूं कि मुझे पहचानों और मेरी नज़ाकत को समझों और उसी के हिसाब से चलते... मेरे शरीर से जो लहरें उठती है... सच मानों अगर किसी भी इंसान ने उन्हें समझने की कोशिश की है..... और लहरों के हिसाब से राह पर चलते रहने का प्रयास किए है... मैने कभी उसे धोखा नहीं दिया... लेकिन जिस किसी ने भी मुझे महज एक पल का अहसास समझ कर मेरे तूफान से गुजरने की कोशिश की है... वो कभी मेरे तूफान से बाहर नहीं निकल पाया... मैं सिर्फ इतना ही कहना चाहता हूं....
न मुझ से तेरा कोई रिश्ता , न मेरी तुझ से कोई दुश्मनी
मैं सिर्फ एक अहसास हूं. जिसकी न कोई परछाई है, न कोई रोशनी
मैं हर वक्त तेरे साथ हूं.. तेरे सांसों में.. तेरे सुख दुख में
अब ये तेरा नज़रें है... कि तू मुझे सुख में पहचना है या फिर दुख में........।
Tuesday, December 29, 2009
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